Saturday, November 03, 2012

Good old school times!

वक़्त की रफ़्तार है, नहीं तो अभी कल ही की तो बात है,
वो छोटी सी बात को लेकर तुरंत खफा हो जाना,
"मिस, ये लड़कियां तो ऐसी ही हैं!", "ये लड़के तो निक्कमे ही हैं!",
अगले ही दिन फिर इसको भूल जाना और किसी नयी बात पे लड़ लेना,
हम सब ऐसे ही थे, वो सब भी ऐसी ही थीं,
तभी तो वो वक़्त याद आता है जब हर तरफ सिर्फ बेफिक्री ही थी ||

आज हम वहाँ नहीं हैं, हमने वो जगह खाली की,
इस आशा में कि कल कोई और हमारी जगह लेगा,
कोई और वहीं बैठ कर किसी और से लड़ रहा होगा,
तब वो बेफिक्री भी वक़्त की ही देन थी, आज ये जिम्मेदारी भी उसी की देन है ||
वक़्त?? वक़्त का क्या है, वो तो ऐसे ही चलेगा,
ना तो उसे तुम्हारी कोई परवाह है और ना ही मेरी ....

Sunday, November 06, 2011

तू

ऐ मेरी कविता की भूमिका, तू सिर्फ कविता में नहीं है |
तेरी आहट से महका है ये गुलशन, तू सिर्फ गुलिस्तां में नहीं है |
तेरा एहसास है हर दम इन साँसों में, मौजूदगी का आलम ये
कि रखूं नयन खुले तो लगे है पर्दा सा, बंद कर लूं तो तू कहाँ नहीं है ?

अजनबी हैं हम, मुलाकातों का सफ़र अभी अधूरा है |
रिवाज़ों की एक दीवार है, समाजों का एक पहरा है |
इस इंतज़ार में कि होंगे शुष्क होठ उन होठों से गीले,
तन्हाई का ये लम्हा और भी हसीन और सुनहरा है ||

ये लम्हे एक दिन गुज़र जायेंगे, दीवारें भी ढह जाएँगी,
जब आप होंगी हमसे रु-ब-रु, तनहाइयाँ तनहा रह जाएँगी |
पतझड़ में भी फूल खिलेंगे, बिन सावन बादल बरसेंगे |
और ये बीते तनहा लम्हे महफ़िलों को तरसेंगे ||

तेरे आने का ही ज़िक्र है हर जुबां पर, और क्या कहूँ?
कि होठ सूख चले हैं, पर मन कहता है कि इन्तहा नहीं है |
"क्षितिज" इतना ही कहूँगा कि अब आजा जीवन में ख्वाबों से निकल कर |
सिर्फ मेरी कविता में ही कैद रहना तेरा दायरा-ए-जहाँ नहीं है ||

Wednesday, September 28, 2011

Us...



Smiles all around, may no grieves surround.
Let nothing stop the pace, whatever we may face.
Together we are, together we will be.
Nothing can keep you far away from me.

Whatever may be the situation, whatever may be the condition.
Smiles should always be around, happiness should always find us.
No one should be sad, no one should feel alone.. I know,
you'll hold hands of each other, for it is care for each other that binds us.

(Dedicated to our family and uncleji (this poem is written on his behalf ...)

Monday, May 23, 2011

गर उसने हाँ कर दी होती....

Thanks to AD (Anu Didi), who convinced me to post it. :-) 

दिल की एक तन्हा धड़कन दूसरी धड़कन से कहती |
गर उसने हाँ कर दी होती, आज जिंदगी अलग ही होती ||

हाथ में मोबाइल ना होता, ना ही पीछे खिड़की होती | 
गुलाबी साड़ी में लिपटी, नजरें झुकी झुकी सी रहती |
सर पे बिंदी आँख में काजल, काले बाल संवारा करती |
ऐसे नज़ारे पे ये नज़रें बस उनको ही "निहारा" करती |
ये भी होता, वो भी होता, जाने क्या हद कर दी होती |
किन्तु यह सब तो तब होता, गर उसने हाँ कर दी होती || 

बूँद बूँद से गागर भरता, राहगीर प्यासा न रहता |
आवारा बादल नदियों की प्यास पर न्योछावर होता |
सब नदियाँ एक धारा बनकर सागर की हैं प्यास बुझाती |
दूर गगन नक्षत्र निवासी, होती काश 'क्षितिज' की प्यासी |
इस मरू भूमि पर भी ओंस की एक बूँद मुस्काती |
किन्तु यह सब तो तब होता गर वो हमसे मान ही जाती  || 

सबके साथी, हम अकेले, एक आकांक्षा अपनी भी थी |
हाथों में एक हाथ होता, एक सर होता इस काँधे भी |
चांदनी जैसे नील गगन में, रहती वो भी इस मन में |
सागर के संग जैसे लहरें, और दीये संग जैसे बाती |
इस सूने आंगन में भी एक छम छम सी पायल इठलाती |
किन्तु यह सब तो तब होता गर वो हमसे मान ही जाती ||

क्षमा प्रार्थी जो कहा उनको कि चाहे 'कोई' भी होती |
'किसी' को भी हमने तो बस 'हाँ' ही कर दी होती |
कहत क्षितिज! ऐ नादाँ, गर नादानी न कर दी होती |
ना सिर्फ मेरी, आज तेरी भी ज़िन्दगी अलग ही होती ||

Monday, September 13, 2010

My trips..

I will be soon posting the experiences of my trips in Europe. The blog will be activated very soon again...

Sunday, November 29, 2009

नफरत से मुहब्बत

मेरा और नफरत का हुआ सामना ,
मैंने बड़ी नफरत से देख उसे बोला,
ऐ नफरत मुझे नफरत है तुझसे |
अंजाम ये कि इस नफरत से भी नफरत है ||

मैं चाहूँ तो भी ये नफरत नहीं मिटती,
मिटाने वाले मिट जाते हैं ये नहीं घटती |
नफरत, जो दिलों के बीच इमारत है ,
नफरत, जो अज सबसे बड़ी तिजारत है,
क्या उसकी इतनी बड़ी रियासत है ?

मुझे नफरत को जहाँ से मिटाना है,
इसकी रियासत को गिराना है,
ये नफरत मिट जाए खुदा से यही इबादत है,
नफरत ना हो तो ये जहाँ ही जन्नत है |

अपने लिए इतनी नफरत देख नफरत बोली,
" जीवन तो दिया नहीं जाता किसी को,
गम तो बांटे नहीं जाते किसी के,
आंसू तो पोंछे नहीं जाते किसी के,
ऐ क्षितिज! कैसी ये तेरी फितरत है !!

ये ना कह कि किसी से नफरत है,
कह हर उस चीज़ से मुहब्बत है,
जो इस कायनात में खुदा की कुदरत है,
और नफरत भी इस दुनिया में उसी की रहमत है || "

Sunday, June 28, 2009

एक मौत और.....

बजी शहनायियाँ, तबले भी करने लगे थे शोर,
शादी का दिन था, थिरक रहे थे लोग |
खुश थे सब, आनंद से थे भोर विभोर ,
दुल्हन की सहेलियां नाचती थीं मनो मोर |
खुशियाँ ही खुशियाँ हर तरफ़ दिखती थीं चारों ओर,
सुख का माहौल था, दुःख का था न कोई ज़ोर |

माँ बाप ने सोचा आखिर उनकी मेहनत रंग लायी |
आज उनकी बेटी दुल्हन बनकर घर से लेगी विदाई |
सपना एक तो हुआ पूरा दूसरे की आस जताई |
किंतु यह क्या? गरीबी उनके बीच में आई |
वर पक्ष ने जो रखी मांग, असमर्थता जताई |
दुल्हन के दरवाजे से बारात लौट कर आई |

पल में सब खत्म हुआ, हो गए चूर सब सपने,
देखे थे जो ख्वाब, हो सके वो न अपने |
गरीबी पर था आक्रोश, किंतु बेगाने तो बेगाने,
हो कर भी जो न हो सके, उस ब्याह को कौन माने?
ऐसे समाज में जीने से तो मर जाना अच्छा,
जिस समाज में जान कर भी कोई न जाने |

थोड़ी देर पहले जिस लड़की को मिलने वाला था 'साथी',
उसी का 'साथ' न पाकर , दे दी अपनी आहुति |
खुशी का माहौल सारा मातम में बदला,
कौन सुनेगा री तुझे बावरी तू तो ठहरी अबला |
जाने कब तक छाया रहेगा अँधियारा, जाने कब होगी भोर |
इस दहेज़ की सेज पर एक मौत और, बस एक मौत और | |